Home कलम से नई शिक्षा नीति 2020 पर क्या बोली M.A की छात्रा

नई शिक्षा नीति 2020 पर क्या बोली M.A की छात्रा

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Picture courtesy: Third-party.

नई दिल्ली: जैसे ही नई शिक्षा नीति आई हमने सोचा क्यों ना छात्रों से पूछा जाए कि इस मामले में उनकी राय क्या। जानिए क्या कहा M.A पढ रही छात्रा ने।

आज मैं बहुत पछता रही हूं यह सोचकर कि मैं डबल एमए क्यों कर रही हूं, क्योंकि अब नई शिक्षा नीति के तहत जब तक पीएचडी न हो तब तक कॉलेज में प्रोफेसर के तौर पर नही पढ़ा सकते। पहले ऐसा था कि नेट क्लियर हो तो असिस्टेंट प्रोफेसर बन सकते थे, पर नई शिक्षा नीति में एमफिल को खत्म कर दिया गया है। अब स्टूडेंट्स को एमए के बाद नेट और एंट्रेंस के बेस पर एडमिशन मिलेगा। सवा सौ करोड़ आबादी के देश मे पीएचडी की केवल नाममात्र की ही सीटें हैं आखिर किस किसका उसमें एडमिशन होगा? पहले स्टूडेंट्स को एमफिल के ज़रिए पीएचडी तक का रास्ता आसानी से मिल जाता था।

अब मन मे सवाल है कि अगर नेट और पीएचडी का एंट्रेंस क्लियर कर भी लें तो फिर पीएचडी करवाएगा कौन? क्योंकि ये यूनिवर्सिटीज के प्रोफेसर तय करते हैं कि किसको अपने अंडर पीएचडी करवानी है, ज़ाहिर सी बात है वहां बहुत भाई भतीजावाद होता है।

Picture courtesy: Third-party.

सरकार ने एमफिल को खत्म करके ये संदेश दिया है कि उनकी नज़र मे रिसर्च के कोई मायने नही हैं, सरकार ने कह दिया कि एमए के बाद स्टूडेंट्स सीधा पीएचडी कर सकतें हैं पर पीएचडी की सीटों में कहीं पर भी बढोतरी की खबर नही है।

शिक्षा का बजट बढ़ने कम क्यों हैं। सरकार ने बच्चों के पाठ्यक्रम में भाषाओं को तो जोड़ दिया, पर बच्चों के कैरेक्टर बिल्ड से सम्बंधित सिलेबस के लिए क्या क्या समाधान है? सरकार ने प्राइवेट और सरकारी यूनिवर्सिटीज के नियम एकसमान करके पूंजीपतियों के बच्चों के लिए रास्ते खोल दिये हैं।

ये सरकार स्किल्ड स्टडी के नाम पर बस पंचर लगाने और पकौड़े तलने ही सिखा सकती है, क्योंकि इन्हें रिसर्च से दिक़्क़त है। और ये नई शिक्षा नीति को ऐसे समय पर मंज़ूरी दी गई जब कोरोना के कारण इसका विरोध भी नहीं किया जा सकता है।

कहीं ना कहीं इस छात्रा कि बातों में वजन है। क्योंकि शिक्षा नीति तो ले आए लेकिन आधारिक संरचना के बारे में सरकार डिब्बा गोल है। साथ में सरकार को इस नीति में मात्र भाषा पर ज़ोर देने कि आवश्यकता थी जिसमें सरकार नाकाम रही है। दुनिया भर के सभी सफल देश अपनी मात्र भाषा पर ज़ोर दे रहे हैं लेकिन भारत दूसरे भाषा पर ज़ोर दे रहा है जो कि हमारे मात्र भाषा को तिरसकार है।

एक तरफ इस नीति के कुछ फैसले अच्छे भी हैं जैसे आपकी एक या दो साल कि विश्वविद्यालय कि पढाइ व्यर्थ नहीं जाएगी। आपको उसका प्रमाणपत्र दिया जाएगा।

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और साथ में बच्चों को भी उनके पसंद के विषयों को पढने के लिए आज़ादी दी जाएगी। कागज़ पर यह बेहद खूबसूरत है, लेकिन इसे तकतकाल प्रभाव से लागू करना उतना ही मुशकिल। सबसे पहले तो स्कूल में जितने भी अध्यापक है उन्हे इस नीति के मायने समझा कर तैयार करना होगा। नए नीति के लिए बजट भी चाहिए होगा, वह सिर्फ पत्रकार सम्मेलन से हल नहीं होगा।

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