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न्यूज़ चैनल की एंकर ने कि आत्महत्या, वजह अभी तक साफ़ नहीं

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Picture courtesy: Third-party.

एक न्यूज़ चैनल की एंकर प्रिया जुनेजा ने आत्महत्या कर ली हैं। आत्महत्या की वजह अभी तक साफ़ नहीं हो पायी है। बताया जा रहा है कि नौकरी चले जाने से वह काफी दुखी थीं। प्रिया लुधियाना की रहने वाली थीं, उन्होंने jk24×7, सीएनएन न्यूज और खबर फास्ट जैसे चैनलों में काम किया था।

आज के दौर में पढ़े लिखे और कुछ हद तक कामयाब युवा भी नौकरी के कारण डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। अभी फिलहाल मैं यहां पत्रकारिता के क्षेत्र की बात कर रही हूं। जब कोई स्टूडेंट पढाई करके पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखते हैं तो इंटर्नशिप से लेकर नौकरी मिल जाने तक का रास्ता बड़ा पेचीदा सा होता है।

निम्न घरों से आये स्टूडेंट्स के लिए कई महीनों तक या सालों तक किसी बड़े संस्थान में इंटर्नशिप करना संभव नही हो पाता क्योंकि वो हर महीने का खर्च नही उठा पाते। और जब वो नौकरी के लिए रिज़्यूम भेजते हैं तो बड़ें संस्थान के एचआर कहते है कि आपके पास किसी बड़े संस्थान का एक्सपीरियंस नही है।

और अगर किसी ने पहले किसी अच्छी जगह इंटर्नशिप की भी हो तो नौकरी के लिए संस्थान उन्हें टरकाते रहते है। अब आते हैं मीडिया में छोटे संस्थानो पर। जहां कुछ लोग जॉइन कर लेते है यह सोचकर कि बड़ी जगह मौका नही मिला तो तब तक यही काम करते हैं। और ये छोटे संस्थान जॉब लेटर तक नही देते बस टरका देते हैं कि बाद में देंगे। पर वो बाद कभी नही आता।

फिर जब छोटे संस्थान से निकला व्यक्ति बड़े संस्थानो में अप्लाई करता है तो उसका रिज़्यूम एक्सेप्ट नही होता। हो भी जाये तो जॉब लेटर मांगा जाता है पहले वाले संस्थान का। अब उसमे उस व्यक्ति कि क्या गलती जब पहले वाले संस्थान में उसे लेटर मिला ही न हो।

आपको यकीन नही होगा लेकिन कई जगह तो सिक्युरिटी गार्ड रिज़्यूम कलेक्ट करते हैं। अगर आपको अंदर जाना हो तो तभी जाने देंगे जब आपका अंदर कोई लिंक हो। या उनसे फोन पर बात करवानी पड़ेगी सिक्युरिटी की।

अब आप खुद सोचो कि कैसा महसूस होता होगा एक पढ़े लिखे युवा को की उसका रिज़्यूम एक सिक्युरिटी गार्ड कलेक्ट कर रहा है जबकि ये उसका काम नही है, और अगर आप रिज़्यूम मेल करोगे तो आपके पास कोई जवाब आने में सालों भी लग सकते हैं। अगर सकीन ना हो तो करके देखो।

तनख्वाह देने के नाम पर कुछ संस्थान इतनी कंजूसी करते है कि उस व्यक्ति से ज़्यादा तो एक मजदूर दिहाड़ी करके कमा लेता है। और मीडिया कोर्स की फीस इतनी होती है कि आम परिवारों के लिए उनका खर्चा उठना संभव नहीं होता। उपर से कुछ कॉलेज में मीडिया कि पढाई के नाम पर सिर्फ उनको टरकाया जाता है।

पहले तो यह काम देते नही, और काम पर रखने से पहले एक्सपीरियंस कई वर्षों का मांगते हैं। ऐसे में पत्रकारिता की सर्टिफिकेट प्राप्त करके आये उस व्यक्ति के सपने पिस जाते हैं।

और कोई थोड़ा बहुत इस क्षेत्र में सफल होने भी लगे तो उसे तमाम धमकियों और कई बार ज़िल्लतों का सामना भी करना पड़ता है।

Picture courtesy: Third-party.

और नेपोटिज़्म केवल बॉलीवुड में ही नही, पत्रकारिता के क्षेत्र में भी है। अगर आपके नाम के पीछे का सर नेम बॉस को अच्छा लगा तो आपका भला हो सकता है या फिर आपके लिंक अच्छे हो। अन्यथा ईश्वर ही जानें।

टैलेंट की कद्र हर जगह होती है। टैलेंटिड लोगो को मौका भी मिलता है। कुछ लोग केवल अपने दम पर सफल होते है। और कुछ लोग नेपोटिज़्म के बल पर। पर ज़रूरी नही ना कि हर कोई मल्टी टैलेंटिड ही हो। या हर किसी का गॉड फादर हो इस क्षेत्र में। ऐसे मे ऐवरेज लोगो को भी चांस मिलना चाहिए।

हम ख़ुद अक्सर बहुत व्यथित हो जातें हैं। जब माता पिता पूछते हैं कि बेटा क्या हुआ नौकरी का? उस समय नज़रें झुक जाती हैं कि इन्हें क्या बताएं ये सब।

खैर इस विषय पर इतना कुछ है कहने को कि आप पढ़ते हुए भी थक जायेंगे।

पर इन सब बातों के बावजूद डिप्रेशन में रहना कोई समझदारी नही है।  ज़िंदगी को एक नौकरी से तुलना करके उसे सस्ता मत समझिये। और अगर किसी का कोई सपना अधूरा रह भी गया तो उसे इतना बड़ा मत बनाइये की वो आपसे आपकी सांसें छीन ले। नए विकल्पों को खोजिए उन्हें मौका दीजिये। अच्छी नौकरी आपकी कामयाबी तय कर सकती है पर क़ाबिल आप बिना नौकरी के भी हो सकते हो। आत्महत्या अंतिम विकल्प नही होना चहिए। हमें जैसी भी लाइफ मिले उसे कोशिश करते हुए सर उठा कर जीना चाहिए।

सपना यादव

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